कदम 6: प्रार्थना – कैसी करना चाहिये

प्रभु यीशु ने अपने अनुयायियों को प्रार्थना करना सिखाया, यदि आप उनसे मांगोगे तो वोआपको भी सिखाने को तैयार है|मेरी प्रार्थना है, प्रभु यीशु मैं आप की आराधना करती हूँ, मैं आपके सामने अपना सिर झुकाती हूँ | आप सर्वशक्तिमान परमेश्वर है | आप मेरे उद्धार कर्ता है | मैं आपकी स्तुति करती हूँ | मैं आप का धन्यवाद देती हूँ | जिन शब्दों के द्वारा उनकी स्तुति होती हो, उन्ही शब्दों का उपयोग करके मैं प्रार्थना करती हूँ |मैं प्रार्थना करती हूँ कि, मैं उन्हें ग़हरे रूप से जानूं और उनके प्रेम का मुझे ज्यादा अनुभव हो | मैं उनसे यह भी पूछती हूँ कि मुझे कैसे प्रार्थना करना चाहिए और जीने  के लिए मार्गदर्शन भी मांगती हूँ | मैं अपने पापों के लिए क्षमा मांगती हूँ| फिर मैं अपने जीवन के हर पहलू के बारे में बात करती हूँ |मैं अपनी जरूरतों के बारे में उन्हें बताती हूँ , और उनसे सहायता मांगती हूँ | मैं अपनी सभी समस्याओं के निवारण हेत उनका मार्गदर्शन मांगती हूँ | मैं अपने परिवार पर आशीष के लिए प्रार्थना करती हूँ और उनकी जरूरतों के लिए भी प्रार्थना करती हूँ | मैं अपने दोस्तों के जीवन परिवर्तन के बारे में उन्हें(दोस्तों को) कैसे बताऊँ यह मैं यीशु प्रभु से जानना चाहती हूँ |

कभी कभी मैं चुप चाप बैठती हूँ | मेरे दिल में मुझे ऐसा लगता है कि मैं उनके चरणों के पास हूँ और यीशु को नमन करती हूँ | मुझे बहुत खुशी और शांति मिलती है|उनसे हर समय बातें करते रहना मन को बहुत भाता है | वे आप के पास है और हमेशा आपकी सुनते हैं |हर रोज उनके पास अकेले में कुछ समय बिताने के लिए वक्त निकालिए | केवल उन्हीं की आराधना करिए और उन्हें बताइए कि आप उनसे कितना प्रेम करते है |उनकी मौजूदगी में शांत बैठिए – और महसूस  करिए वह आपके साथ है, और वह बहुत  खुश है कि आप उनके साथ वक्त बिता रहे है| निश्चय आप उनके प्यार में आराम पाऐंगे |

प्रार्थना :  प्रभु यीशु , मैं आपके साथ समय बिताना चाहती हूँ | मुझे किस तरह प्रार्थना करनी चाहिए, मुझे सिखाइये |

 मुख्य वचन :  निरंतर प्रार्थना में लगे रहो | हर बात में धन्यवाद करो ; क्योंकि तुम्हारे लिए मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है। 1 थिस्सलोनिओं 5:17-18

 

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