कदम 15 : प्रभु यीशु — क्रूस पर हमारे पापों के लिए

प्रभु यीशु – दुनिया के उद्धार कर्ता | समय आ गया प्रभु यीशु को अपना काम करने के लिए :

“वो पापियों को बचाने दुनिया में आए” – 1 तिमोथी 1:15. उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि वे मरने जा रहे हैं | इस बात को सुनकर उनके शिष्य दुखी हो  गये | लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि वे तीसरे दिन जी उठेंगे |धार्मिक नेता उनसे नाराज थे क्योंकि वे लोगों के पाप माफ करते थे | उन्होंने यीशु को बंदी बना लिया और उन पर यह आरोप लगाया कि वे परमेश्वर को अपना पिता कह कर पुकारते हैं | उन्हों ने निर्णय ले लिया कि वे उनको क्रूस पर चढ़ाऐंगें | क्रूस पर उन्हें कीलों से ठोंक देंगे – ऐसी बर्वर सजा जो हत्यारों को दी जाती थी |

आप देखते हैं, कोई भी प्रभु यीशु को पकड़ कर क्रूस पर नहीं चढ़ा सकता था क्यों कि वे परमेश्वर थे लेकिन वे दुनिया में परमेश्वर पुत्र बनकर आये – हमारी सजा की कीमत चुकाने के लिए और हमें पापों से बचाने के लिए | इसलिए उन्होंने किसी का सामना नहीं किया | उन्होंने क्रूस की मृत्यु‍‍ और हमारे लिए पीड़ाएं सहीं | परमेश्वर का पुत्र जिन्होंने बिना पाप का जीवन गुजारा, जो कि दयालु और प्रेमी थे, जिन्होंने सब की सेवा की और भलाई करते गए, उनकी सजा क्रूस पर हुई |

वे पीटे गए और अपमानित किये गए, और नीचा दिखाए गए, काटों का ताज उनके सिर पर रखा गया | सारे उत्पीड़न के बाद वे अत्यंत कमजोर हो गए और उन्हें स्वयं क्रूस लेकर पहाड़ पर चढ़ना पड़ा |वहाँ पहाड़ पर उनके हाथ और पांव पर कील ठोंककर उन्हें क्रूस पर लटका दिया   गया | उन्हें बेहद दर्द हुआ लेकिन वे चुपचाप सहते रहे क्यों कि वे हमारे लिए पीड़ा उठा रहे थे |जब प्रभु यीशु क्रूस पर लटके, उन्होंने सारी दुनिया के पाप, आपके पाप, मेरे पाप अपने ऊपर ले लिये | उन्होंने क्रूस पर हमारे दोष, हमारी हार, और हमारी शर्म को अपने ऊपर ले लिया |प्रभु यीशु उसी दिन क्रूस पर मर गए | उनके दुखी शिष्यों ने, प्रभु का शरीर कपडे़ में लपेट कर बगीचे के कब्र में रखा जाना, देखा |लेकिन तीसरे दिन एक आश्चर्य होने वाला था जो अद्भुत महिमा से भरा हुआ था |

प्रार्थना : प्रभु मैं कौन होता हूँ कि आप मेरे लिए पीड़ित होकर मरे ? मैं आपके चरणों को दंडवत हूँ आपके महान त्याग और बलिदान के लिए |

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